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Rani indramati (रानी इन्द्रमती की कथा)

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रानी इन्द्रमती की कथा द्वापरयुग में चन्द्रविजय नाम का एक राजा था। उसकी पत्नी इन्द्रमति बहुत हीधार्मिक प्रवृति की औरत थी। संत-महात्माओं का बहुत आदर किया करती थी। उसनेएक गुरुदेव भी बना रखा था। उनके गुरुदेव ने बताया था कि बेटी साधु-संतों की सेवाकरनी चाहिए। संतों को भोजन खिलाने से बहुत लाभ होता है। एकादशी का व्रत,मन्त्रा के जाप आदि साधनायें जो गुरुदेव ने बताई थी, वह भगवत् भक्ति में बहुत दृढता से लगी हुई थी। गुरुदेव ने बताया था कि संतों को भोजन खिलाया करेगी तो तू आगे भी रानी बन जाएगी और तुझे स्वर्ग प्राप्ति होगी। रानी ने सोचा कि प्रतिदिन एक संत को भोजन अवश्य खिलाया करूँगी। उसने यह प्रतिज्ञा मन में ठान ली कि मैं खाना बाद में खाया करूँगी, पहले संत को खिलाया करूँगी। इससे मुझे याद बनी रहेगी। कहीं मुझे भूल न पड़ जाये। रानी प्रतिदिन पहले एक संत को भोजन खिलाती फिर स्वयं खाती। वर्षों तक ये क्रम चलता रहा।एक समय हरिद्वार में कुम्भ के मेले का संयोग हुआ। जितने भी त्रिगुण माया के उपासक संत थे सभी गंगा में स्नान के लिए (परभी लेने के लिए) प्रस्थान कर गये।इस कारण से कई दिन रानी को भोजन कराने के लिए कोई...