परमेश्वर कबीर साहिब
परमेश्वर कबीर साहिब
आज मानव बहुत ही ज्यादा परेशान महसूस कर रहा है सुख खोजने के लिए मानव परमात्मा को खोज रहा है जो हमको सुख दे सकता है लेकिन किसी को यह यह नही पता है कि हम किस परमात्मा की साधना करें हर इंसान किसी न किसी देवों की पूजा में लगा है और फिर भी दुःख झेल रहा है लेकिन हमको यह नही पता है कि इस पृथ्वी पर वास्तविक भगवान है जो हमको सर्व सुख दे सकता है उसका नाम है "कबीर" आपको सुनकर हैरानी होगी लेकिन यही वो परमात्मा है जो सब लाभ दे सकता है आप के भयंकर से भयंकर रोग का निवारण कर सकता है यह मैं विश्वास के साथ कह सकता हूँ तो आप एक बार प्रयत्न करके देख तो लो हम अन्य देवताओं के भी तो चक्कर लगा रहे है अधिक जानकारी के लिए नचे स्टेप को फॉलो करें ।
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परमात्मा कौन है
कबीर साहेब ही वास्तविक परमात्मा है विश्वास नहीं हो रहा है तो आप प्रमाण भी देख सकते है
श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन करें
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गीता जी के अनुसार परमात्मा की महिमा
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कबीर दास परमेश्वर के दास थे, परमेश्वर नहीं थे Kabeer ke Dohe
ReplyDeleteभारत में अपने अपने गुरूओं को ईश्वर घोषित करने वालों की एक बहुत बड़ी तादाद है। उनमें एक नाम श्री रामपाल जी का भी है। वे कबीरपंथी हैं और उन्हें जगतगुरू कहा जा रहा है। जगतगुरू के अज्ञान की हालत यह है कि उन्हें अपने गुरू का पूरा नाम और उसका अर्थ भी पता नहीं है।
शॉर्ट में जिस हस्ती को कबीर कह दिया जाता है। उसका पूरा नाम कबीर दास है। कबीर अरबी में परमेश्वर का एक गुणवाचक नाम है जिसका अर्थ ‘बड़ा‘ है। दास शब्द हिन्दी का है, जिसका अर्थ ग़ुलाम है। कबीर दास नाम का अर्थ हुआ, ‘बड़े का दास‘ अर्थात ईश्वर का दास। कबीर दास ख़ुद को ज़िंदगी भर परमेश्वर का दास बताते रहे और लोगों ने उन्हें परमेश्वर घोषित कर दिया। श्री रामपाल जी भी यही कर रहे हैं। जिसे अपने गुरू के ही पूरे नाम का पता न हो, उसे परमेश्वर का और उसकी भक्ति का क्या पता होगा ?
…लेकिन यह भारत है। यहां ऐसे लोगों की भारी भीड़ है। अज्ञानी लोग जगतगुरू बनकर दुनिया को भरमा रहे हैं। अगर कबीरपंथी भाई कबीर दास जी के पूरे नाम पर भी ठीक तरह ध्यान दे लें तो वे समझ लेंगे कि कबीर दास परमेश्वर नहीं हैं, जैसा कि अज्ञानी गुरू उन्हें बता रहे हैं।

परमेश्वर से जुदा होने और उसका दास होने की हक़ीक़त स्वयं कबीर दास जी ने कितने ही दोहों में खोलकर भी बताई है। कबीर दोहावली में यह सब देखा जा सकता है। उनका पूरा नाम उनके मुख से ही सुन लीजिए-
माया मरी न मन मरा, मर मर गए शरीर।
आशा तृष्णा न मरी, कह गए दास कबीर।।
वह स्वयं परमेश्वर से प्रार्थना भी करते थे। वह कहते हैं कि
साई इतना दीजिये जा मे कुटुम समाय।
मैं भी भूखा न रहूं साधु भी भूखा न जाय।।
एक दूसरी प्रार्थना में उनके भाव देख लीजिए-
मैं अपराधी जन्म का, नख सिख भरा विकार।
तुम दाता दुख भंजना, मेरी करो सम्हार।।
कबीर दास जी रात में उठकर भी भगवान का भजन करते थे-
कबीरा सोया क्या करे, उठि न भजे भगवान।
जम जब घर ले जाएंगे, पड़ी रहेगी म्यान।।
भजन में भी वे अपना नाम न लेकर राम का नाम लेते थे-
लूट सके तो लूट ले, राम नाम की लूट।
पाछे फिर पछताओगे, प्राण जाहिं जब छूट।।
राम के सामने कबीर दास जी अपनी हैसियत बताते हुए कहते हैं कि मेरे गले में राम की रस्सी बंधी है। वह जिधर खींचता है, मुझे उधर ही जाना पड़ता है अर्थात अपने ऊपर मेरा स्वयं का अधिकार नहीं है बल्कि राम का है।
कबीर कूता राम का, मुतिया मेरा नाउँ।
गलै राम की जेवड़ी, जित खैंचे ति�� जाऊँ।।
राम नाम का ज्ञान भी उन्हें स्वयं से न था बल्कि यह ज्ञान उन्हें अपने गुरू से मिला था-
गुरू गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पाय।
बलिहारी गुरू आपनो, गोविंद दियो बताय।।
इसमें कबीर दास जी स्वयं कह रहे हैं कि जब तक उनके गुरू ने उन्हें परमेश्वर के बारे में नहीं बताया था, तब तक उन्हें परमेश्वर का ज्ञान नहीं हुआ था।
क्या यह संभव है कि परमेश्वर को कोई दूसरा बताए कि परमेश्वर कौन है ?
कबीर दास जी कहते हैं कि अगर सतगुरू की कृपा न होती तो वे भी पत्थर की पूजा कर रहे होते-
हम भी पाहन पूजते होते, बन के रोझ।
सतगुरू की किरपा भई, सिर तैं उतरय्या बोझ।।
क्या यह संभव है कि अगर परमेश्वर को सतगुरू न मिले तो वह भी अज्ञानियों की तरह पत्थर की पूजा करता रहे ?
कबीर दास जी अपने गुरू के बारे में अपना अनुभव बताते हैं कि
बलिहारी गुरू आपनो, घड़ी सौ सौ बार।
मानुष से देवत किया, करत न लागी बार।।
कबीर दास जी की नज़र में परमेश्वर से भी बड़ा स्थान गुरू का है-
कबीर ते नर अन्ध हैं, गुरू को कहते और।
हरि रूठै गुरू ठौर है, गुरू रूठै नहीं ठौर।।
परमेश्वर और कबीर एक दूसरे से अलग वुजूद रखते हैं। उनके आराध्य राम उन्हें बैकुंठ अर्थात स्वर्ग में आने का बुलावा भेजते हैं तो वह रोने लगते हैं। उन्हें बैकुंठ से ज़्यादा सुख साधुओं की संगत में मिलता है। देखिए-
राम बुलावा भेजिया, दिया कबीरा रोय।
जो सुख साधु संग में, सो बैकुंठ न होय।।
कबीर दास जी के इतने साफ़ बताने के बाद भी लोग उनकी बात उनके जीवन में भी नहीं समझते थे । उनके मरने के बाद भी लोगों ने उनसे उल्टा चलना नहीं छोड़ा। देखिए वह कहते हैं कि
समझाय समझे नहीं, पर के साथ बिकाय।
मैं खींचत हूं आपके, तू चला जमपुर जाय।।
अहो भाग्य, कबीर साहब के जिसने राम नाम जपते जपते अपने आप को ब्रह्म स्वरूप बना लिया । भगवान भी राम ना म की कितनी महिमा है नही समझा पाते कोई भी प्रभु की प्रताप का वर्णन नही कर सकता है ।
ReplyDeleteमैने कबीर दास द्वारा रचित बीजक तथा साखी का अध्ययन किया । मुझे अनुभव हुआ कि कबीर दास राम नाम जपने मे इतना लीन रहते थे कि रात को, कार्य करते,बात करते, सोते समय लगभग हमेशा वे प्रभु कि चिन्तन मे लीन रहते। धन्य है ऐसे संत जो गुरुदेव मे तथा राम नाम मे बहुत श्रद्धा और विश्वास रखते थे ।जुलाहा कबीर राम राम जपके महान बन गई ।कबीर मे सद्भावना भी राम नाम जपने से हुआ जैसे बाल्मीकि को हुआ था।आज कबीर को सबसे ज्यादा महत्व दिया जाता है । इसका पुरा प्रताप राम नाम का है ना कि कबीर की ।जय श्री राम अरे मरा मरा भी जपकर बाल्मीकि बह्म समान हो गये और तो बात ही क्या अहो भाग्य, कबीर साहब के जिसने राम नाम जपते जपते अपने आप को ब्रह्म स्वरूप बना लिया । भगवान भी राम नाम की कितनी महिमा है नही समझा पाते कोई भी प्रभु की प्रताप का वर्णन नही कर सकता है ।
कबीर दास द्वारा रचित बीजक :-
रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय ।
हीरा जन्म अमोल सा, कोड़ी बदले जाय ॥
अर्थ :- रात नींद में नष्ट कर दी – सोते रहे – दिन में भोजन से फुर्सत नहीं मिली यह मनुष्य जन्म हीरे के सामान बहुमूल्य था जिसे तुमने व्यर्थ कर दिया – कुछ सार्थक किया नहीं तो जीवन का क्या मूल्य बचा ? एक कौड़ी Sant Kabir
जब मैं था तब हरी नहीं, अब हरी है मैं नाही ।
सब अँधियारा मिट गया, दीपक देखा माही ।।
अर्थ :- जब मैं अपने अहंकार में डूबा था – तब प्रभु को न देख पाता था – लेकिन जब गुरु ने ज्ञान का दीपक मेरे भीतर प्रकाशित किया तब अज्ञान का सब अन्धकार मिट गया – ज्ञान की ज्योति से अहंकार जाता रहा और ज्ञान के आलोक में प्रभु को पाया।
कबीर रेख सिन्दूर की काजल दिया न जाई। नैनूं रमैया रमि रहा दूजा कहाँ समाई ॥अर्थ :- कबीर कहते हैं कि जहां सिन्दूर की रेखा है – वहां काजल नहीं दिया जा सकता. जब नेत्रों में राम विराज रहे हैं तो वहां कोई अन्य कैसे निवास कर सकता है ?
अपना सुख आत्मारूपी राम है बाकी संसार में सभी दुख रूप हैं मन वनज और कर्म से आत्मा राम का सुमिरन करने के लिए कबीर दास जी कहते हैं कि सुमिरन ही समस्त पदार्थों का सार है।